भारतीय भाषा कार्यक्रम, सीएसडीएस द्वारा आयोजित
प्रतिमान-व्याख्यान शृंखला में आपका स्वागत है
पहाड़ी संस्कृति, पर्यावरण और आपदा
वक्ता: शेखर पाठक
अध्यक्षता: अभय कुमार दुबे
18 अगस्त 2021,चार बजे
विषय-सार: पहाड़ी संस्कृति, पर्यावरण और आपदा तीन स्वतंत्र विषय हैं। बाहर से देखने पर ये जुड़े हैं और भीतर से देखने पर इनको एक साथ देखना मुश्किल होता है। कम-से-कम मेरे वास्ते। ऐसी कोशिशें भी कम की गईं हैं।
वैसे भी तमाम लोग हिमालय को नहीं उससे कुछ हिस्सों को देखते हैं। कश्मीर को अलग और अरुणाचल को अलग। उत्तराखंड, नेपाल या भूटान को अलग। तिब्बत को देखना तो भूल ही जाते हैं। इसकी पूर्व-पश्चिमी निरन्तरता के साथ इसका उत्तर-दक्षिणी रिश्ता भी नज़रअंदाज़ हो जाता है। ऊपर से भारत के उत्तर में हिमालय देखने की पुरानी आदत कभी भी इसे एशिया के बीच में नहीं देख पाती है। इसलिए संस्कृति का पर्यावरण और आपदा से रिश्ता ठीक से समझ में नहीं आता।
संस्कृति, पर्यावरण और आपदा तीनों का मूल रिश्ता भूगोल और उससे जुड़े भूगर्भ से है। हिमालय का ऊपर उठता और निरन्तर नीचे बहता भूगोल संस्कृतियों और पर्यावरण को भी ऐसा ही करने को विवश करता है। आन्तरिक बेचैनी और बाहरी नाजुकता हिमालय का स्वभाव है और उसे छिपाना उसके लिए संभव नहीं है। विशाल गल, ऊँचे शिखर और गहरी घाटियाँ इस गति को बहुगुणित कर देती है। हिमालय का पर्यावरण और आपदाएँ एक-सी उम्र वाली हैं, इसमें सिर्फ़ संस्कृति बाद में आई है, मनुष्य के साथ। जब-जब मनुष्य ने पर्यावरण से समझौता किया प्रकारान्तर में उसे उसका लाभ मिला। आपदाएँ फिर भी थीं और मनुष्य उनसे समायोजन कर लेता था।
पर अब आपदाओं में मनुष्य द्वारा की गई अति का दुष्परिणाम जुड़ गया है, जिससे ये बहुगुणित हो गई हैं। सामाजिक और आर्थिक जीवन प्राकृतिक सम्पदाओं की क़ीमत पर सम्पन्न होना चाहता है। जिसमें एक सीमा से आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन अनेक आपदाओं का समुच्चय है और आगामी आगामी अनेक आपदाओं या संकटों को जन्म देने वाला भी। इस कारण न हम टिकाऊ अर्थव्ववस्था बना पाएँगे, न समाज। आपदाएँ अब अनेक सालों में नहीं, सालाना होने लगी हैं। हर मौसम में आपदा होने लगी है। कॉरपोरेटों को बिक रही राज्य व्यवस्था के निकम्मेपन के दौर में समाज इससे लड़ने की ऊर्जा से अभी तक तो लैस नहीं है। इस व्याख्यान में कुछ-कुछ इन तीनों विषयों को छूने का प्रयास होगा।
शेखर पाठक प्रख्यात पर्यावरणविद, कार्यकर्ता और इतिहासकार। कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैतीताल, के पूर्व-प्रोफ़ेसर, नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय के पूर्व-फ़ेलो, और पहाड़ संस्था व पत्रिका के संस्थापक-संपादक। हालिया कृतियाँ: दास्तान-ए-हिमालय और हरी-भरी उम्मीद।
अभय कुमार दुबे विकासशील समाज अध्ययन पीठ में प्रोफ़ेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक हैं।