हिंदी मीडिया, बेपनाह ताक़त के ख़तरे

हिंदी ख़बरों का आम उपभोक्ता एक विश्वासी क़िस्म का जीव है। वह मानता है कि मीडिया-मंचों से मिल रही ख़बर सिलसिलेवार जारी करने से पहले उनके स्रोतों और सबूतों की प्रोफ़ेशनल पड़ताल की जा चुकी होगी। जिस हद तक नेट पर 50 करोड़ हिंदुस्तानियों को सारी दुनिया की सचित्र जानकारियाँ आज उपलब्ध हैं, गूगल और फ़ेसबुक उनके विदेशी गुरु बन कर उभर रहे हैं। इस हलचल भरे बदलाव के बीच फ़ेक न्यूज़ का बडे़े व्यवस्थित तरीक़े से प्रवेश मीडिया और लोकतंत्र के सारे पहरुओं के लिये चिंता और कार्रवाई का सबब बनना चाहिए। पिछले दो चुनावों के दौरान हमने नये-पुराने हिंदी मीडिया के नाना रूपों की जिन ताक़तों और कमज़ोरियों के पास से दर्शन किये हैं, यह बातचीत उसी पर केंद्रित है।

मशहूर दुभाषी लेखिका मृणाल पाण्डे प्रिंट एवं टेलीविज़न मीडिया की जानी-मानी हस्ती हैं। उनका साहित्य तथा शोधपरक लेखन शहरी जीवन, सामाजिक व सांगीतिक परिवेश में महिलाओं की स्थिति को गहराई से व्यक्त करते हैं। अगस्त 2009 तक वे हिन्दी दैनिक "हिन्दुस्तान" की सम्पादिका और 2010 से 2014 तक प्रसार भारती बोर्ड की अध्यक्ष रहीं।

अध्यक्षता:

अभय कुमार दुबे सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डिवेलपिंग सोसाइटीज़ में प्रोफ़ेसर व भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक हैं।

बुधवार, 28 अगस्त 2019
शाम 5:30 बजे, सीएसडीएस सेमिनार रूम
29 राजपुर रोड, दिल्ली 110054