12th Issue of Pratiman Available Free Online

Volume-12, July-December 2018 (Click to Read)

प्रतिमान का यह अंक दो महत्‍तवपूर्ण प्रत्‍ययों—  उत्‍तर-औपनिवेशिकता के राजनीतिक परिदृश्‍य  तथा विचारों और ज्ञानोत्‍पादन के वि-उपनिवेशीकरण पर केंद्रित है. इस क्रम में आदित्‍य निगम ने ‘राजनीति की अवधारणा और वैचारिक स्‍वराज’ के सैद्धांतिक विमर्श, उर्मिलेश ने उत्‍तर और मध्‍य भारत में द्वजि-हिंदुत्‍व गोलबंदी के निहितार्थ तथा नीरज जैन ने मराठा आंदोलन के संदर्भ में आरक्षण बनाम रोज़गार की विचारोत्‍तेजक पड़ताल की है. इन लेखों के अलावा आदिवासी भारत की परिकल्‍पना और उसके ज्‍वलंत मुद्दों पर केंद्रित परिचर्चा मौजूदा राजनीति के स्‍याह हाशियों पर नज़र डालती है. उल्‍लेखनीय है कि आदिवासी समुदायों पर एकाग्र यह बहस कमल नयन चौबे की पुस्‍तक जंगल की हक़दारी : राजनीति और संघर्ष पर केंद्रित समीक्षा-संवाद में भी जारी रहती है.

प्रस्‍तुत अंक के दूसरे प्रत्‍यय— विचार और ज्ञानोत्‍पादन के वि-उपनिवेशीकरण से संबंधित सामग्री संस्‍कृत के अध्‍ययन की पूर्व-आधुनिक परंपराओं और भारतीय मानस के आत्‍म-संघर्ष का एक बहुआयामी चित्र पेश करती है. मसलन, राधावल्‍लभ त्रिपाठी का संधानपरक लेख— ‘पंडितों का संसार : संसार में पंडित’ ज्ञान की पूर्व-औपनिवेशिक परंपराओं के एक अल्‍पज्ञात पक्ष से परिचय कराते हुए वैचारिक स्‍वायत्‍तता के संभावित स्रोतों की ओर संकेत करता है, तो अम्बिकादत्‍त शर्मा अपने लेख— ‘भारतीय मानस का वि-औपनिवेशीकरण’ में उपनिवेशवाद के परिणामस्‍वरूप ख‍ंडित हुई भारतीय आत्‍मचेतना के पुनर्गठन की संभावना तलाश करते हैं. महिषासुर विमर्श के औचित्‍य की थाह लेता संजय जोठे का लेख— ‘ज्ञात के ज़रिये अज्ञात को समझने की तीसरी दृष्टि’ मिथकों के विनियोग की राजनीति को संबोधित करता है.

बहस, पुनर्चिंतन और संवाद की ज़रूरत को रे‍खांकित करते उपरोक्‍त लेखों के अतिरिक्‍त प्रस्‍तुत अंक में ऐश्‍वर्ज कुमार, मुकुल प्रियदर्शिनी, चारू गुप्‍ता, संजू सरोज तथा रमाशंकर सिंह के शोध-लेख हिंदी की अंदरूनी लड़ाई और चुनौतियों, जाति और लिंग के देशज आख्‍यानों, दलित समुदायों में उपेक्षा और बहिष्‍करण की कम चर्चित संरचनाओं तथा घूमंतु समुदायों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का एक विस्‍तृत संसार निर्मित करते हैं.